सुषमा स्वराज

6 अगस्त 2019 को भारत ने अपनी सबसे प्रिय बेटी, सुषमा स्वराज को खो दिया। भारतीय मीडिया और सोशल मीडिया उन पर सभी तरह की कहानियों से लबरेज थे। जिस समय से उन्होंने संसद के एक युवा सदस्य के रूप में राजनीति में प्रवेश किया, उस समय से ही उन्हें काम के प्रति समर्पण और प्रतिबद्धता और एक उत्कृष्ट वक्ता के रूप में हमेशा याद किया जाएगा।

लेकिन मैं यह पोस्ट उनके राजनीतिक करियर के बारे में बात करने के लिए नहीं लिख रही हूं। हम सभी ने इसे पर्याप्त रूप से देखा और अनुभव किया है। मैं यह बताने के लिए भी नहीं लिख रही हूं कि वह एक उत्कृष्ट वक्ता थीं। हमने उनके भाषणों को खूब सुना है । इन तमाम कहानियों के बीच एक कहानी वो थी जो मुझे लगता है कि उनके लिए भी सबसे महत्वपूर्ण रही होगी। यह पोस्ट सुषमा के बारे में नहीं है, उसके स्वराज के बारे में है।

मैंने हाल ही में श्री स्वराज कौशल के बारे में पढ़ा था । हमारे इस पुरुष प्रधान समाज में स्वराजजी पति रूप में वो शक्ति का स्तम्भ साबित हुए जिसकी हर महिला केवल कल्पना ही कर सकती है। इसके बावजूद कि उनका अपना कैरियर भी कम नहीं था। 34 वर्ष की आयु में वह भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नामित सबसे कम उम्र के वरिष्ठ अधिवक्ता थे।

बहुत से लोग इस बात से अवगत नहीं हैं कि उन्होंने मिजोरम शांति समझौते के लिए लड़ाई लड़ी और पूर्वोत्तर क्षेत्र में उनका काम उल्लेखनीय है। उन्हें 37 वर्ष की आयु में भारत के सबसे कम उम्र के राज्यपाल होने का सम्मान प्राप्त है। उनकी पत्नी, सुषमा 1977 में 25 वर्ष की आयु में सबसे कम उम्र की कैबिनेट मंत्री थीं।

उन दोनों के पास एक शानदार पेशेवर जीवन था। इसके बावजूद मैंने कुछ लेखों में जो थोड़ा बहुत उनकी शादी के बारे में पढ़ा उससे पता चलता है कि उनकी दोस्ती और सहचर्य कभी कम नहीं हुआ । अत्यंत सफल लोगों की शादी का सफल होना वह भी तब जब पत्नी सामाजिक दृष्टि में आगे हो हमारे देश में बहुत कम देखने को मिलता है। यह वास्तव में स्वराजजी के चरित्र के बारे में हमें बहुत कुछ बताता है।

इस दंपत्ति ने अन्य कई सामाजिक मानदंडों को भी खारिज कर दिया। सुषमा अपने पति से 5 महीने बड़ी थी। लेकिन जो रिश्ता इतना ठोस और सुरक्षित हो, उसमें ये तथ्य शायद ही मायने रखते हैं। इससे भी अधिक आश्चर्य की बात यह है कि दोनों अलग-अलग राजनीतिक विचारों के थे। जहां सुषमा के पिता आरएसएस से संबंध रखते थे, वहीं स्वराज के समाजवादी विचारधारा के थे। अलग-अलग राजनैतिक विचारधारा होने पर भी उनका वैवाहिक जीवन सुखमय था। ये आज की पीढ़ी को उनसे सीखना चाहिए।

सुषमा और स्वराज की इकलौती संतान थी उनकी बेटी बांसुरी । जहाँ एक ओर भारत अभी भी कन्या भ्रूण हत्या और बलात्कार जैसे मुद्दों से जूझ रहा है इस पति पत्नी की जोड़ी ने हमें सिखाया कि बेटियां तो अनमोल है । और कितनी सुषमाओं को पैदा होना पड़ेगा हमें ये सिखाने के लिए कि बेटी भी परिवार के लिए उतना ही सम्मान और गौरव ला सकती है। सिर्फ परिवार के लिए ही नहीं बल्कि पूरे देश के लिए । जब उनकी बेटी ने अंतिम संस्कार किया, तब इस दंपति ने सामाजिक मानदंडों को फिर से परिभाषित किया। इससे पहले भी हमने पूर्व प्रधानमंत्री अटलजी की बेटी को अपने पिता का अंतिम संस्कार करते देखा। सिर्फ बांसुरी ही नहीं, सुषमा ने भी अपने ससुर की इच्छा के अनुसार उनका अंतिम संस्कार किया था । समाज की सोच बदलने के लिए हमें और अधिक दृढ़ महिलाओं की आवश्यकता है।

लेकिन मजबूत महिलाएं समाज की धारणाओं को बदलने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। उनके साथ उनसे भी मजबूत पुरुषों का होना भी आवश्यक है। इस देश में कई महिलाएं हैं जिन्होंने सामाजिक मानदंडों को चुनौती देने की कोशिश की है, लेकिन इस प्रयास में उन्हें ज्यादातर टूटे हुए घरों या असफल रिश्तों के अलावा कुछ नहीं मिला। क्योंकि उनके अपने परिवारजन उन्हें समझने में विफल रहते है और उन्हें सही तरह से सहयोग नहीं देते ।

हमारे देश में कई सुषमा हैं। लेकिन हमें ज़रुरत है तो और अधिक स्वराज की जो अपनी पत्नी / बेटी / माँ / बहन को पूरी तरह से विकसित होने और खिलने के लिए सकारात्मक वातावरण दे सकें । काश हर सुषमा के पास अपना ‘स्वराज’ होता …

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Ritu Vyas

IT Professional with 10+ years of experience, blogger at heart. This website is my dream child where I combine both my passions. I feel there is a lot that still needs said and done for women in workplaces.

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