क्या नियम ही सब कुछ है ?

कभी कभी हमारे साथ कुछ ऐसा होता है जो हमें यह सोचने पर मजबूर कर देता है कि क्या हम अपने ही बुने जालों में उलझते जा रहे हैं | हमने नियम इसीलिए बनाये जिससे हमारा काम करने का तरीका आसान हो | लेकिन क्या हमेशा नियमों का पालन करना सही है ? क्या कभी कभी नियमों को तोड़ने की ज़रुरत नहीं पड़ सकती ?

मेरा बेटा साल भर का हो गया था | पर उसे डाउन सिंड्रोम होने के कारण मैं ऑफिस वापस ज्वाइन नहीं कर सकती थी | इस दौरान मुझे ऑफिस का लैपटॉप वापस करना था | मेरे पति ज़रूरी काम से शहर के बाहर गए हुए थे | आस पास ऐसा कोई नहीं था जिसके पास मैं बेटे को २-३ घंटे के लिए छोड़ सकूं | मैंने सोचा लैपटॉप केवल आईटी डिपार्टमेंट में देना है , ५ मिनट का काम है बेटे को लेकर ही ऑफिस चली जाती हूँ | ऑफिस का नियम है कि बच्चों को अंदर अनुमति नहीं है | मैं यह अच्छे से जानती थी पर कोई और विकल्प न होने के कारण मैंने यही ठीक समझा |

बेटे को गोद में लिए मैंने अपना कार्ड दरवाज़े पर स्वाइप किया और मैं खुद सिक्योरिटी गार्ड के पास गयी | रजिस्टर में अपना नाम साइन कर रही थी कि उसने कहा मैडम बच्चे को बाहर छोड़कर आइये बच्चों को अंदर अनुमति नहीं है | मैंने कहा मैं जानती हूँ पर क्या करती , कोई और था नहीं जिसके पास छोड़ सकूं | मुझे सिर्फ यह लैपटॉप देना है आईटी डिपार्टमेंट में। जब वह फिर बोला बच्चे को बाहर छोड़कर आइये तो मैंने उससे विनती की कि वो ही लैपटॉप अंदर लेकर चला जाए या अंदर से किसी को बाहर भेज दें | या अंदर डिपार्टमेंट में फ़ोन करके मेरी एक बार बात करवा दें | लेकिन वो मुझसे कहने लगा कि बच्चे को बाहर छोड़ के आइये | मैंने कहा बच्चा अभी खड़ा होना भी नहीं सीखा है , मैं कहाँ छोड़ू इसे ? लेकिन वो कुछ सुनने को तैयार नहीं था |  बस यही रट पकडे हुए था कि बच्चे को गेट के बाहर छोड़कर आइये |

इतने में एक मैनेजर वहां से गुजर रहे थे और उन्होंने ये सब सुन लिया | क्या हुआ भाई उन्होंने सिक्योरिटी गॉर्ड से पूछा | जब पूरी बात उनके समझ आयी तो उन्होंने कहा बच्चे को अपनी कुर्सी पर बिठा दे और मैडम को अंदर जाके लैपटॉप देके आने दे, २ मिनट भी नहीं लगेंगे | नियम ज़रूरी है पर कभी अक्कल से भी काम ले लिया करो | इतना छोटा बच्चा कैसे बाहर रहेगा ? उन्होंने सिक्योरिटी गॉर्ड को जैसे डांट लगायी | मेरी सांस में सांस आयी | मैं बेटे को कुर्सी पर बिठाकर अंदर जाकर लैपटॉप दे आयी | उस दौरान वो मैनेजर भी बाहर खड़े मेरे बेटे का ध्यान रख रहे थे | उनका धन्यवाद कर मैं बेटे को लेकर ऑफिस के बाहर आ गयी | मेरा मन तो बहुत कर रहा था उस सिक्योरिटी गॉर्ड को सुनाने का पर कुछ न कहना ही मैंने ठीक समझा |

मैं जानती हूँ कि वो सिर्फ अपना कर्तव्य निभा रहा था और नियम मैंने तोडा था लेकिन फिर भी न जाने क्यों आज भी मुझे वही गलत लगता है | इस बात को अब ५-६ साल हो चुके है पर अभी तक यह बात मेरे ज़हन से नहीं निकलती | क्या उसे बच्चे को २ मिनट रखने के लिए कोई नौकरी से निकाल देता ? क्या वो एक बार मेरी आईटी डिपार्टमेंट में बात नहीं करा सकता था ? और यदि उसको यह डर था की नियम का उल्लंघन करने पर उसकी नौकरी पर कोई खतरा है तो वो अपने सुपरवाइजर को बुला सकता था और निर्णय उन पर छोड़ देता | जो बच्चा खड़ा नहीं हो सकता उसे बाहर छोड़कर आने की कैसी ज़िद थी ये | सुबह ही बैंगलोर से मेरे मैनेजर का फ़ोन आया था और लैपटॉप उसी दिन देना ज़रूरी था | मुझे ऑफिस आने में १ घंटा लगा था | क्या मैं वापस सिर्फ इसलिए चली जाती कि बच्चों को ऑफिस में अनुमति नहीं है ? नियम ज़रूरी हैं पर कभी कभी हमें अपनी समझदारी का इस्तेमाल कर, परिस्तिथि को आंककर नियमों को तोडना भी पड़ सकता है | इस बारे में आपका क्या विचार है ?

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Ritu Vyas

IT Professional with 10+ years of experience, blogger at heart. This website is my dream child where I combine both my passions. I feel there is a lot that still needs said and done for women in workplaces.

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